सात फेरे सात वचन और जिंदगी भर साथ निभाने की कसमें । लेकिन आज अखबार खोलते ही रूह कांप जाती है। कहीं सुहाग की रात ही सुहाग का कत्ल हो रहा है। तो कहीं शादी के कुछ महीने बाद ही प्रेमी के साथ मिलकर पति को रास्ते से हटाया जा रहा है। आखिरकार क्यों हमारा समाज इस खौफनाक मोड पर खड़ा है। क्यों शादी जैसा पवित्र बंधन अब मौत का जाल बनता जा रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में लव ट्रायंगल और एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के चलते होने वाले अपराधों में भारी बढ़ोतरी हुई। राजस्थान के श्रीगंगानगर से लेकर उत्तर प्रदेश के बागपत तक हर राज्य से ऐसी खबरें रोज आ रही है। सवाल उठता है कि आखिर रिश्ते इतने कड़वे क्यों हो जाते हैं कि हिंसा की नौबत आ जाती है? इसके पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं:”
संचार की कमी: जब लोग अपनी भावनाओं और समस्याओं के बारे में खुलकर बात नहीं करते, तो गलत फहमी और निराशा बढ़ती है।
उम्मीदों का बोझ: शादी के बाद लोग अक्सर अपने पार्टनर और रिश्ते से अवास्तविक उम्मीदें रखते हैं, जिससे तनाव पैदा होता है।
बाहरी प्रभाव: सोशल मीडिया या दोस्तों के गलत प्रभाव में आकर लोग अपने रिश्ते के बारे में गलत धारणाएं बना सकते हैं।
वित्तीय या पारिवारिक दबाव: पैसों की तंगी या परिवार का दबाव भी रिश्तों में दरार डाल सकता है।
इन समस्याओं को रोकने और स्वस्थ रिश्ते बनाने के लिए हमें सही कदम उठाने होंगे:”
खुलकर और ईमानदारी से बात करें (Communication): अपनी भावनाओं और चिंताओं को अपने पार्टनर के साथ साझा करें। एक-दूसरे की बात सुनें।
प्रोफेशनल मदद लें: अगर आपको लगता है कि आप अपनी समस्याओं का समाधान खुद नहीं कर पा रहे हैं, तो किसी मैरिज काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लें।
कानूनी विकल्पों को जानें: अगर रिश्ता ठीक नहीं हो पा रहा है और आप अलग होना चाहते हैं, तो तलाक या कानूनी अलगाव जैसे विकल्पों के बारे में जानकारी लें। ये सुरक्षित और कानूनी तरीके हैं।

नैतिक मूल्यों को महत्व दें: समाज में रिश्तों के प्रति ईमानदारी, सम्मान और विश्वास के मूल्यों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
प्रेम और रिश्ते जीवन को बेहतर बनाते हैं, न कि खत्म करते हैं। जब भी रिश्तों में मुश्किलें आएं, तो हमेशा सुरक्षित और सकारात्मक समाधान तलाशें। हिंसा कभी भी किसी समस्या का हल नहीं होती।”
जब रिश्ते विश्वास की नींव खो देते हैं और गलत रास्ते अपनाए जाते हैं, तो सिर्फ दो लोग ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार बिखर जाता है। ये वो कीमत है जो हर उस व्यक्ति को चुकानी पड़ती है जिसने इस विनाशकारी रास्ते को चुना। एक पल में, जो अपना था वो पराया हो जाता है, और जो घर था वो सिर्फ दीवारें रह जाती हैं। क्या कोई पल भर का धोखा इतना बड़ा हो सकता है कि सालों के रिश्ते और विश्वास को मिट्टी में मिला दे?
हमें यह भी समझना होगा कि समाज का दबाव इन अपराधों को कैसे बढ़ावा देता है। आज भी हमारे समाज में ‘रिश्तों के टूटने’ को मौत से भी बदतर माना जाता है। इसी बदनामी के डर से कई लोग कानूनी रास्ता अपनाने के बजाय ‘हिंसा’ का रास्ता चुन लेते हैं। हमें समाज की इस सोच को बदलना होगा। अगर दो लोग साथ नहीं रह सकते, तो उन्हें सम्मान के साथ अलग होने का मौका मिलना चाहिए, ताकि कोई तीसरा शख्स इस दरार का फायदा उठाकर घर में दुख का बीज न बो सके।”
अपराधी चाहे कितनी भी सावधानी बरत ले, कानून की नजर से बचना नामुमकिन है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गंभीर अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। वो साथी, जो आज साथ मिलकर अपराध का सपना दिखा रहा है, कल जेल की सलाखों के पीछे सबसे पहले आपका साथ छोड़ेगा।
अंत में याद रखिए… प्यार जीवन देता है, लेता नहीं। अगर किसी रिश्ते में विश्वास खत्म हो जाए, तो उसे कानूनी रूप से खत्म करना बेहतर है, न कि उसे विनाश की ओर ले जाना। क्योंकि इस दुखद खेल में जीत किसी की नहीं होती, केवल बर्बादी होती है।”
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