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Poona Pact in Hindi : एक समझौता जिसने बदल दी समाज की दिशा

Poona Pact in Hindi : एक समझौता जिसने बदल दी समाज की दिशा

Poona Pact in Hindi ambedkar and gandhi imagePoona Pact 1932 Photo - Wikipedia
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Poona Pact in Hindi : भारत स्वतंत्रता की राह पर संघर्ष कर रहा था, लेकिन उस समय समाज जातिगत विभाजन से भी जूझ रहा था। 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडॉनल्ड ने कम्युनल अवार्ड की घोषणा की, जिसमे दलित यानी अस्पृश्य कहे जाने वाले समाज को अलग निर्वाचन क्षेत्र Separate Electorates दिए जाने का प्रस्ताव रखा गया। इस फैसले के अनुसार दलित समाज के लोग अपने अलग प्रतिनिधि चुन सकते थे। यह व्यवस्था दलितों को राजनीतिक शक्ति तो देती, लेकिन इससे हिंदू समाज और अधिक विभाजित हो सकता था।

इसी मुद्दे पर दो महान नेताओं की राहें टकराईं – डॉ. भीमराव अंबेडकर जो दलितों के अधिकारों के प्रबल समर्थक थे और महात्मा गांधी जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ थे, लेकिन हिंदू समाज की एकता बनाए रखना चाहते थे। कम्युनल अवॉर्ड के विरोध में महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल पूना में आमरण अनशन शुरू कर दिया। यही घटना आगे चलकर पूना पैक्ट का कारण बनी।

महात्मा गांधी का आमरण अनशन

गांधीजी का मानना था कि अलग निर्वाचन व्यवस्था हिंदू समाज को दो भागों में बाँट देगी सवर्ण और दलित। उनका विश्वास था कि दलितों की स्थिति सुधारने के लिए सामाजिक सुधार और राजनीतिक अधिकार दोनों जरूरी हैं, लेकिन अलग निर्वाचन से स्थायी दूरी बन जाएगी। जेल से ही गांधीजी ने कहा- मैं दलितों के अधिकारों के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन अलग निर्वाचन हिंदू समाज को तोड़ देगा। गांधीजी के आमरण अनशन की खबर फैलते ही पूरे देश में चिंता और हलचल मच गई। अखबारों में रोज़ यही सुर्खी होती थी कि गांधीजी की हालत नाज़ुक। लाखों लोग प्रार्थनाएं करने लगे।

दूसरी ओर, डॉ. भीमराव अंबेडकर जी भी मजबूती से खड़े थे। वे दलितों के अधिकारों के लिए कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि जब तक दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, वे सच्ची आज़ादी का लाभ नहीं उठा पाएंगे। स्थिति बेहद संवेदनशील थी एक ओर गांधीजी का जीवन संकट में था, दूसरी ओर अंबेडकर जी के लिए यह दलित समाज के भविष्य का सवाल था।

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Poona Pact in Hindi- ऐतिहासिक वार्ता और समझौते की दिशा

गांधीजी का स्वास्थ्य बिगड़ते देख देशभर में दबाव बढ़ा कि किसी समाधान पर पहुँचना ही होगा। ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं ने प्रयास शुरू किए कि अंबेडकर जी और गांधीजी किसी साझा राय पर सहमत हों। अंततः 24 सितंबर 1932 को पूना यरवदा जेल में दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई। कई दौर की चर्चाओं के बाद Poona Pact पर सहमति बनी।

इस समझौते के मुख्य बिंदु थे

दलितों को अलग निर्वाचन की जगह सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से आरक्षण Reservation in seats मिलेगा। ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित 71 सीटों के स्थान पर दलित समाज को 148 सीटें दी जाएंगी। प्रांतीय विधानसभाओं और केंद्र में भी अनुसूचित जातियों के लिए सीटें सुरक्षित की जाएंगी।अनुसूचित जातियों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में भी उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा। दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया कि सामाजिक समानता और भाईचारा बनाए रखना ज़रूरी है।

पूना पैक्ट के परिणाम

पूना पैक्ट भारतीय राजनीति और समाज के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ।

राजनीतिक दृष्टि से- दलितों को अलग-थलग होने से बचाया गया। उन्हें भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और आरक्षण का अधिकार मिला। यह समझौता आगे चलकर भारत के संविधान में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की नींव बना।

सामाजिक दृष्टि से- गांधीजी ने हरिजन आंदोलन शुरू किया, जिससे अस्पृश्यता मिटाने के लिए देशव्यापी अभियान चला। अंबेडकर जी ने भी सामाजिक और शैक्षिक सुधारों पर अधिक ध्यान दिया। आलोचनाएं भी हुईं कुछ विद्वानों का मानना है कि अगर अलग निर्वाचन व्यवस्था लागू होती तो दलित समाज और अधिक राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होता। वहीं, कुछ लोग इसे हिंदू समाज की एकता के लिए सही निर्णय मानते हैं।

आखिर में कुछ –

एक समझौता जिसने भारत की दिशा बदल दी पूना पैक्ट केवल एक समझौता नहीं था, बल्कि यह भारत की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा का निर्णायक मोड़ था।‌ इसने दलित समाज को राजनीतिक अधिकार दिलाए। हिंदू समाज की एकता को बचाया और भविष्य में भारतीय संविधान की आरक्षण नीति की नींव रखी। आज जब हम दलित समाज के उत्थान, शिक्षा और राजनीति में उनकी बढ़ती भागीदारी देखते हैं, तो कहीं न कहीं इसकी जड़ें पूना पैक्ट तक पहुँचती हैं।

पूना पैक्ट हमें यह सिखाता है कि मतभेद चाहे कितने भी गहरे क्यों न हों, बातचीत और समझौता ही किसी समाज की सच्ची ताकतहोती है ।

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