42वां संविधान संशोधन- भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। लेकिन 1976 में हुए 42वें संविधान संशोधन को सबसे बड़ा और विवादित बदलाव माना जाता है। इसे कई बार ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि 42वां संशोधन क्या था, क्यों किया गया, इसमें क्या बदलाव हुए और इसके प्रभाव क्या पड़े।
आपातकाल की पृष्ठभूमि :
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) घोषित कर दिया। यह अवधि 1975 से 1977 तक चली और इसे भारत के लोकतंत्र के लिए एक काले दौर के रूप में देखा जाता है।
आपातकाल के दौरान सरकार ने विपक्ष, प्रेस, न्यायपालिका और यहां तक कि आम जनता की स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगाया। इसी समय 1976 में 42वां संविधान संशोधन पारित किया गया।
42वें संशोधन में क्या-क्या बदलाव हुए ?
1. प्रस्तावना में बदलाव :
42 वे संविधान संशोधन में संविधान की प्रस्तावना में तीन नए शब्द जोड़े गये ।
- समाजवादी (Socialist)
- धर्मनिरपेक्ष (Secular)
- राष्ट्रीय एकता और अखंडता (Unity & Integrity of the Nation)
इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी देश है।
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2. न्यायपालिका की शक्ति सीमित :
42 वे संविधान संशोधन के जरिए न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति को कम कर दिया गया। अदालतें अब संसद द्वारा बनाए गए कुछ कानूनों को चुनौती नहीं दे सकती थीं।
3. नीति निदेशक तत्वों को प्राथमिकता :
Directive Principles of State Policy (DPSP) को मूल अधिकारों (Fundamental Rights) से ऊपर रखा गया। इसका मतलब था कि सरकार अगर कोई कानून DPSP को लागू करने के लिए बनाती है, तो वह वैध माना जाएगा, भले ही वो नागरिकों के मूल अधिकारों से टकराए।
4. राष्ट्रपति की भूमिका कमजोर :
42 वें संविधान संशोधन आने के बाद राष्ट्रपति एक रबर स्टांप मात्र रह गए।
42 वें संविधान संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह का पालन करना अनिवार्य कर दिया गया।
केंद्र को कानून व्यवस्था संबंधी मामलों से निपटने के लिए राज्यों में केंद्रीय बलों को तैनात करने के लिए अनुच्छेद 257ए लाया गया ।
5. लोकसभा और विधानसभा का कार्यकाल बढ़ा :
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की अवधि 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दी गई, जिससे जनता को अपने प्रतिनिधि बदलने का मौका देर से मिला।
6. अदालत में चुनौती :
एक प्रावधान जोड़ा गया कि कोई भी संविधान संशोधन अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती , जिससे संसद को असीमित अधिकार मिल गए।
आलोचना और प्रतिक्रिया :
इस संशोधन की न्यायविदों, विपक्ष और बुद्धिजीवियों ने कड़ी आलोचना की। इसे लोकतंत्र और संविधान की आत्मा पर हमला माना गया।

44वां संशोधन – सुधार की शुरुआत :
1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उसने 1978 में 44वां संशोधन लाकर 42वें संशोधन के कई विवादास्पद प्रावधानों को हटा दिया
- लोकसभा कार्यकाल फिर से 5 साल किया गया
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल हुई
- मूल अधिकारों को फिर से प्राथमिकता दी गई
आखिर में कुछ :
42वां संविधान संशोधन हमें सिखाता है कि जब लोकतंत्र पर खतरा आता है, तब संविधान की रक्षा सिर्फ क़ानून से नहीं, जन-जागरूकता से होती है। हमें न सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए, बल्कि संविधान की मूल भावना को भी समझना चाहिए।
❣ “जहां ज्ञान है, वहीं शक्ति है।”
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